मीडिया की दुनिया में ईमानदारी और नैतिकता के लबादे के नीचे बेईमानी और अनैतिकता के बंगले हैं, जिसके नीचे कई काले कीड़े रेंगते रहते हैं और अपने ही पड़ोसियों को काटते रहते हैं। वो समझते हैं कि इस पेशे में सीधे और ईमानदार लोग चूतिये होते हैं। इसी पर है मेरी बमबम दृष्टि। कुछ लोग इसे मेरी कुंठा भी मान सकते हैं-
ये चूतियों का शहर है।
कौन किसकी मार लेगा
कह नहीं सकता कोई।
लिखी मक्कारी गांड पर
पढ़ नहीं सकता कोई
लात पीछे पड़ गई तो
कह रहा, ये कहर है।।
ये चूतियों का शहर है।
दीन और ईमान की
खुलकर लगाते बोलियां।
इंसानियत के कत्ल को
हैं घूमती ये टोलियां।
वक्त है अजीब सा
रात में दोपहर है।।
ये चूतियों का शहर है।
Tuesday, October 7, 2008
ये चूतियों का शहर है।
Sunday, September 28, 2008
तभी सुनेगा तेरी बात।।
कई साथी इस बात से परेशान हैं कि उनके संपादक या सीनियर या उनके चम्पू उन्हें जंगली तरीके से उत्पीडित करते हैं। उनके लिए एक पुरानी कविता नुमा भडासी गजल प्रस्तुत है। जो हमारे साथियों में प्रचलित थी। आप इससे प्रेरणा ले सकते हैं. किसने लिखा है ये नहीं बताऊंगा। इसमें असंसदीय शब्दों के लिए क्षमा चाहूँगा। क्योंकि मूल रूप में यह और भदेस थी।
उसकी गांड पे मारो लात।
तभी सुनेगा तेरी बात।।
सच का साबुन मारोगे तो
तुरत दिखेगी उसकी जात।।
चापलूसी और लल्लो चप्पो
काम न आएगी, हे तात । ।
आग लगा दो पानी में तुम
इतनी तेरी है औकात। ।
आज ही जाकर मुह पर थूको
तभी सुनेगा तेरी बात।।
उसकी गांड पे मारो लात । ।
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