Sunday, September 28, 2008

तभी सुनेगा तेरी बात।।

कई साथी इस बात से परेशान हैं कि उनके संपादक या सीनियर या उनके चम्पू उन्हें जंगली तरीके से उत्पीडित करते हैं। उनके लिए एक पुरानी कविता नुमा भडासी गजल प्रस्तुत है। जो हमारे साथियों में प्रचलित थी। आप इससे प्रेरणा ले सकते हैं. किसने लिखा है ये नहीं बताऊंगा। इसमें असंसदीय शब्दों के लिए क्षमा चाहूँगा। क्योंकि मूल रूप में यह और भदेस थी।


उसकी गांड पे मारो लात
तभी सुनेगा तेरी बात।।

सच का साबुन मारोगे तो
तुरत दिखेगी उसकी जात।।

चापलूसी और लल्लो चप्पो
काम आएगी, हे तात । ।

आग लगा दो पानी में तुम
इतनी तेरी है औकात। ।

आज ही जाकर मुह पर थूको
तभी सुनेगा तेरी बात।।

उसकी गांड पे मारो लात । ।